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झीरम घाटी नक्सली हमले की 12वीं बरसी: अब तक नहीं पूरी हुई जांच, सियासत तेज

रायपुर/सुकमा। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले की झीरम घाटी में हुए भीषण नक्सली हमले को आज 12 साल पूरे हो गए हैं, लेकिन इस त्रासदी की जांच आज भी अधूरी है। 25 मई 2013 को हुआ यह हमला राज्य के राजनीतिक इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। इस हमले में कांग्रेस के 27 नेताओं और कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्या कर दी गई थी, जिनमें तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा और विधायक उदय मुदलियार शामिल थे।

12 साल बाद भी न तो इस हत्याकांड की परतें पूरी तरह खुल सकी हैं और न ही दोषियों को सजा मिल पाई है। यही कारण है कि हर साल झीरम हमले की बरसी पर सियासी बयानबाजी तेज हो जाती है। इस बार भी कुछ अलग नहीं हुआ। झीरम घाटी कांड की 12वीं पुण्यतिथि पर छत्तीसगढ़ की सियासत फिर गर्मा गई है।

भाजपा विधायक अजय चंद्राकर का कांग्रेस पर तीखा हमला
भाजपा के तेजतर्रार विधायक और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर ने कांग्रेस और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा,

“कांग्रेस और भूपेश बघेल को न तो न्याय से कोई मतलब है और न ही जांच से। उन्हें सिर्फ झीरम जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करनी आती है।”

चंद्राकर ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने पांच सालों तक इस कांड की जांच को जानबूझकर लटकाए रखा। न तो एसआईटी से कोई ठोस नतीजा निकला और न ही मामले में पारदर्शिता रही।

जांच पर उठते सवाल
झीरम घाटी हमले की जांच पहले एनआईए ने शुरू की थी, लेकिन अब तक कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है। बाद में भूपेश बघेल सरकार ने विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था, पर वह भी निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच पाई।

राजनीतिक दृष्टिकोण बनाम पीड़ितों का न्याय
राजनीतिक दल जहां इस मुद्दे को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, वहीं शहीद नेताओं के परिजन अब भी न्याय की आस लगाए बैठे हैं। हर साल की तरह इस साल भी झीरम घाटी में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई, लेकिन उनके परिजन और समर्थक यही सवाल कर रहे हैं कि – “आखिर 12 साल बाद भी सच्चाई सामने क्यों नहीं आई?”

निष्कर्ष:
झीरम घाटी नक्सली हमला सिर्फ एक आतंकवादी घटना नहीं थी, बल्कि वह छत्तीसगढ़ की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा सवाल भी था। 12 साल बाद भी इस मामले की अधूरी जांच लोकतंत्र और न्याय प्रणाली के लिए एक चिंता का विषय है। अब देखना यह होगा कि अगली सरकारें इस हत्याकांड को राजनीतिक मुद्दा बनाने की बजाय न्याय दिलाने की दिशा में कितनी गंभीरता से काम करती हैं।

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