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छत्तीसगढ़ की पारंपरिक ‘आक्ति गुड्डा-गुड़िया बिहाव’ परंपरा: बच्चों के खेल में छिपा सामाजिक संस्कार और सांस्कृतिक शिक्षा

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराएं जितनी गहराई लिए हुए हैं, उतनी ही सरल, सुंदर और अर्थपूर्ण भी हैं। ऐसी ही एक रोचक और विशेष परंपरा है ‘आक्ति गुड्डा-गुड़िया बिहाव’, जो हर साल अक्षय तृतीया के अवसर पर गांवों में बड़े उत्साह और सामाजिक भावना के साथ मनाया जाता है। यह परंपरा बच्चों के गुड़िया-गुड्डे की शादी के बहाने उन्हें समाज, रिश्तों और संस्कारों की शिक्षा देने का एक सहज और सांस्कृतिक माध्यम है।


क्या है ‘आक्ति गुड्डा-गुड़िया बिहाव’?

‘आक्ति गुड्डा-गुड़िया बिहाव’ का तात्पर्य है – अक्षय तृतीया पर बच्चों द्वारा गुड़िया और गुड्डे का विवाह करना।
यह एक पारंपरिक खेल के रूप में शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक आयोजन बन गया। इस दिन बच्चे अपनी-अपनी गुड़िया और गुड्डे की पूरे रीति-रिवाजों के साथ शादी कराते हैं, जिसमें पूरा गांव या मोहल्ला भाग लेता है।


इस परंपरा की मुख्य विशेषताएं:

  1. बच्चों के लिए पारंपरिक संस्कार की पाठशाला:
    बच्चे इस खेल के माध्यम से विवाह के रीति-रिवाज, रिश्तों का महत्व, सामाजिक व्यवहार और आयोजन की जिम्मेदारी सीखते हैं।
  2. गांव में सामूहिक उत्सव:
    ग्रामीण महिलाएं और पुरुष इस आयोजन में सहभागी बनते हैं। बच्चे बाराती और घराती बनते हैं, नाच-गाना, हल्दी-मेहंदी, कन्यादान जैसी रस्में निभाई जाती हैं।
  3. सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर:
    ‘गुड्डा-गुड़िया बिहाव’ के बहाने परिवार, पड़ोसी और समाज एक साथ मिलकर सामूहिकता और सद्भाव का अनुभव करते हैं।
  4. लोकगीत और परंपराएं जीवंत होती हैं:
    इस आयोजन के दौरान आक्ति गीत, नाच और पारंपरिक पकवानों का भी आयोजन होता है, जिससे लोकसंस्कृति का संरक्षण और संवर्धन होता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

  • यह परंपरा बचपन में ही जिम्मेदार नागरिकता की भावना का बीजारोपण करती है।
  • बच्चे रिश्तों को समझते हैं और समाज के तौर-तरीकों से परिचित होते हैं।
  • इसमें नारी सम्मान, परिवार की एकता और लोकरीतियों का आदान-प्रदान जैसे मूल्य अंतर्निहित होते हैं।

समकालीन समाज में इसका स्थान

आज जबकि डिजिटल युग ने बच्चों को मोबाइल और टीवी तक सीमित कर दिया है, ‘गुड़िया-गुड्डा बिहाव’ जैसी परंपराएं उन्हें मिट्टी, रिश्तों और समाज से जोड़ने का जरिया बनती हैं।
कुछ स्कूल और सांस्कृतिक संस्थाएं अब इस परंपरा को ‘संस्कारात्मक खेल’ के रूप में पुनर्जीवित कर रही हैं।


निष्कर्ष:

आक्ति गुड्डा-गुड़िया बिहाव’ छत्तीसगढ़ की उन सांस्कृतिक परंपराओं में से है जो खेल के बहाने शिक्षा, संस्कार और संस्कृति का समन्वय कराती है। यह केवल मनोरंजन नहीं, संस्कारों की रोपाई और समाज से जुड़ाव की एक अनूठी परंपरा है। इस आयोजन से बच्चों में सामूहिकता, परंपरा और सामाजिक समझ की भावना विकसित होती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर है।

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