खैरागढ़, छत्तीसगढ़ | अप्रैल 2025
खैरागढ़ जिला मुख्यालय में स्थित एकमात्र सिविल अस्पताल, जो कभी हजारों ग्रामीणों के लिए जीवन रेखा था, आज खुद ही इलाज का मोहताज बन गया है। अंग्रेजों के शासनकाल में 1936 में बना यह अस्पताल आज बदहाली और उपेक्षा की जीती-जागती तस्वीर बना हुआ है।
सुविधाएं गायब, खतरे में जान
यह ऐतिहासिक अस्पताल अब जर्जर हालत में पहुंच चुका है।
- दीवारों में दरारें,
- छत से टपकता पानी,
- जगह-जगह टूटी फर्श और
- गंदगी के ढेर —
यहां इलाज के लिए आने वाले मरीजों को ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों को भी अपनी जान खतरे में डालनी पड़ रही है।
न दवाएं, न डॉक्टर, न उम्मीद
- अस्पताल में प्राथमिक उपचार की दवाएं तक समय पर नहीं मिलतीं।
- कई विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद खाली हैं।
- साफ-सफाई की हालत इतनी खराब है कि मरीजों को संक्रमण का खतरा बना रहता है।
- मरीजों के लिए न तो पर्याप्त बेड की सुविधा है, और न ही गंभीर मामलों के लिए कोई वैकल्पिक इंतजाम।
जिला बना, व्यवस्था नहीं बदली
2022 में खैरागढ़ को नया जिला बनाए जाने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि
- स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार आएगा,
- अस्पताल को नए उपकरण और भवन मिलेंगे,
- लेकिन आज भी यह अस्पताल उसी दशा में है जैसे दशकों पहले था।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें इलाज के लिए राजनांदगांव या दुर्ग जैसे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है, जिससे समय और पैसा दोनों की बर्बादी होती है।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से नाराजगी
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार से अस्पताल को पुनर्जीवित करने की मांग की है।
- उनका कहना है कि यदि शीघ्र मरम्मत, सफाई और डॉक्टरों की नियुक्ति नहीं हुई तो ग्रामीणों के लिए यह एक जानलेवा संकट बन जाएगा।
- उन्होंने खैरागढ़ को जिला घोषित करने के बाद भी आधारभूत स्वास्थ्य सेवाओं में कोई बदलाव न होने पर प्रशासन की आलोचना की है।
निष्कर्ष
1936 में बनी यह ऐतिहासिक इमारत अब केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा की प्रतीक बन चुकी है।
आज जरूरत है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस दिशा में तत्काल ठोस कदम उठाएं, ताकि खैरागढ़ के नागरिकों को भी स्वास्थ्य के अधिकार का वास्तविक लाभ मिल सके।
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