रायपुर। ग्राम पंचायत मुण्डा में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं और आचार संहिता उल्लंघन के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और निर्वाचन आयोग से शिकायत करते हुए सरपंच और पंचायत सचिव पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।


आचार संहिता का उल्लंघन
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए 20 जनवरी 2025 को आचार संहिता लागू की गई थी। इसके बावजूद 22 जनवरी को पंचायत सचिव और तत्कालीन सरपंच द्वारा डिजिटल हस्ताक्षर का उपयोग कर वित्तीय स्वीकृति दी गई। शिकायतकर्ताओं ने इसे सीधा आचार संहिता उल्लंघन बताया है।
राष्ट्रीय पर्वों में राशि का बंदरबांट
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर मिठाई और टेंट के नाम पर लाखों रुपये “उमंग होटल” और नीलकंठ साहू को दिए गए। यह 15वें वित्त आयोग के दिशा-निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन है।
जनप्रतिनिधियों के खाते में ट्रांसफर
शिकायत में कहा गया कि तत्कालीन पंच प्रवीन कुमार और अन्य पंचों के व्यक्तिगत खातों में नल और पंप मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये ट्रांसफर किए गए। जबकि नियमों के अनुसार पंचायत राशि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि के व्यक्तिगत खाते में नहीं दी जा सकती।
समाचार प्रकाशन और सीधे खातों में राशि
रजक व्यू एजेंसी को समाचार प्रकाशन के नाम पर लाखों रुपये का भुगतान किया गया। साथ ही नंदराम वर्मा, दिनेश वर्मा, मुरारी लाल पटेल, गोवर्धन साहू सहित कई व्यक्तियों और निजी फर्मों के खातों में बिना किसी पंजीकृत एजेंसी और कार्य निष्पादन के सीधे पंचायत राशि ट्रांसफर की गई।
जमीनी स्तर पर कार्य न होने के बावजूद भुगतान
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कई कार्य जिनका जमीनी स्तर पर कोई क्रियान्वयन ही नहीं हुआ, उनके लिए पूरी राशि आहरित कर ली गई। इससे विकास कार्यों में भारी वित्तीय हानि हुई है।
बड़ी राशि, लेकिन विकास शून्य
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में ग्राम पंचायत मुण्डा को विभिन्न मदों से लगभग 1 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।
15वें वित्त आयोग से 90 लाख
बाजार ठेका से 5 लाख
मूलभूत से 12 लाख
तालाब ठेका से 5 लाख
लेकिन इन पैसों से मुश्किल से 15 लाख रुपये का काम भी नहीं हुआ।
निष्पक्ष जांच की मांग
ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही दोषी सरपंच और सचिव को छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा नियम 1999, लोक सेवा गारंटी अधिनियम और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत पद से बर्खास्त कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए।
संलग्न दस्तावेजों में आचार संहिता लागू होने के बाद किए गए भुगतान और पिछले पांच सालों में बिना बिल–वाउचर के खर्च की प्रतियां शामिल की गई हैं।
