रायपुर। छत्तीसगढ़ के शासकीय महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याताओं की भर्ती प्रक्रिया इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। यह अवसर उन योग्य युवाओं के लिए उम्मीद की नई किरण बन सकता था, जिन्होंने नेट, सेट, एमफिल और पीएचडी जैसी डिग्रियां हासिल कर राज्य का नाम रोशन किया है। लेकिन अफसोस, इस प्रक्रिया का वास्तविक लाभ छत्तीसगढ़ के मूल निवासी युवाओं तक नहीं पहुंच पा रहा है।
नीति के अनुसार स्थानीय अभ्यर्थियों को प्राथमिकता देने का स्पष्ट प्रावधान है और सरकार ने भी हमेशा यही भरोसा दिलाया कि “माटी के बेटा-बेटी” को अवसर मिलेगा। बावजूद इसके, कई कॉलेजों में बाहरी राज्यों से आए उम्मीदवारों को नियुक्ति दी जा रही है, जबकि छत्तीसगढ़ के मेहनती और योग्य युवा बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं।
समाजसेवी समरेंद्र शर्मा का कहना है कि यह केवल नौकरी का प्रश्न नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता और आत्मसम्मान से जुड़ा मामला है। जब स्थानीय युवाओं को ही उपेक्षित कर दिया जाएगा, तो राज्य की शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के युवाओं में क्षमता और संकल्प की कोई कमी नहीं है, जरूरत केवल अवसर और भरोसे की है। अगर नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो और नीति का अक्षरशः पालन किया जाए, तो न सिर्फ बेरोजगारी घटेगी बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी मजबूत होगी।
यह केवल भर्ती की प्रक्रिया नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता, न्याय और समानता की असली परीक्षा है।
